गजल कहता हूँ धड़कनोमे रहती है साँसें तेरी ,मुकुल द्वे। चातक

गजल   कहता  हूँ   धड़कनोमे  रहती  है  साँसें   तेरी 
रोज   घिरी   रहती   है  तन्हाईमे  महकी  बातें  तेरी 

धूप  रुखसत होते ही रुखसार  छुप जाते है जुल्फोमे 
मेरे  मसीहा, मेरे निगहबान ये कातिल है आँखे तेरी 

ख्वाबमे   हम   अपनी   आँखो   से  कैसे  जुदा   करे  
जहनमें  रहते  हो  नहीं  तो तस्वीर  बना  लेते  तेरी 

वार  वो  करते  रहे  हम  बेवफा  कभी  थे   ही  नहीं 
ऐसा  भी   क्या   की  नहीं  भी  उतारे   बलाऐ   तेरी 

खुसबू तेरी तेरे निशांको महका गई मेरी हयाती को 
मत  पूछो  की  ऐ  हवाए  कुछ  बता  गई यादें  तेरी 

मुकुल द्वे। चातक


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