मेरा दर्द पांवोके छालों में था ,मुकुल दावे 'चातक '

मेरा     दर्द    पांवोके    छालों     में  था 
में      उजालोंके      हवालों     में     था 

कुछ  जवाब नहीं,कुछ सवाल नहीं यूही 
नाकामियां का   चहेरा उजालों   में  था 

बिछड़ कर मिले थे अजब मोड़ पर हम 
समुन्दरमे    प्यासे    प्यालों   में    था 

आईना  बिका  नहीं  चहरे  बिकते  रहे 
बाजारू  आलममेँ    सवालों    में    था 

किस   महूरतमें   निकला  था   घरसे 
शाम   तक   चहेरा    ख्यालों  में    था 

मुकुल दावे 'चातक '


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