अहले -संग देते हैं नया अहसास सोचा नहीं हैं-मुकुल द्वे 'चातक '

अहले -संग  देते  हैं नया अहसास सोचा नहीं हैं
दिलमें जलता है चिरागसा हवाका झोंका नहीं हैं

मुकरे   थे   वोऔर  बस्तीमें   जुदाभी   हुए   थे
आज  तक वो  सिल सिला  तुने  मिटाया  नहीं हैं

यह  धुंआ  उठता  क्यूँ  हैं  आँखमे  बार  ही   बार
घर  किसी  गममें  तुने  तो  यूँ  जलाया  नहीं   हैं

यूँ   मिले   कैसे   प्यासी   वो   तलबकी  बू   कोई
आँख  के  आईंनेमें  मौसाम   ये   आया   नहीं  हैं

उसका  इन्तजार  करते  जो  चले  खुद  गये   हो
कब  गये  थे  रूह्से  तबसे  खुदा  आया  नहीं   हैं

अहले -संग =पथ्थर दिल लोग
मुकुल द्वे 'चातक '

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