घनासा हैं अँधेरा और ज्यादा तेज हवा भी,मुकुल दवे 'चातक '


घनासा    हैं  अँधेरा   और   ज्यादा   तेज हवा  भी
पकड़  ले  हाथ  अबभी  हम  जलाऐंगे  दिया   भी

छूटे   साथी   यहाँ   हमें   साजिश  भी  याद भी  हैं
जमानेमें   और   कुछ  सोच  नफरतके  सिवा  भी

टुकड़ा   हर  काचका  भी  आईना सा  लगता ही हैं
अजीब कमबख्त है मुखौटे के अंदाजका नशा भी

बड़ी    मुश्किलसे    पत्थर    टूटता   है   यहाँ   भी
हमारे   ख्बाब   टूटा   कोई   पत्थर  सा  चला  भी

चराग जलता अभी रह जाते है बुझाने बाद दोस्त
भुलानेके  बाद  आते  है याद जब होती है सबा भी

सबा -सुबह
मुकुल दवे 'चातक '

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