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जानता नहीं चाहत मेरी इबादत है , यूँ मिटा न दे मुकुल दवे 'चातक '

जानता नहीं चाहत मेरी इबादत है , यूँ  मिटा न दे पाक  नजरोका  यही  सिलसिला  है,  यूँ  हवा न दे कोई भी  फूल  लाख  करीब  हो उसको…

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